Jupiter planet

Jupiter planet.
                     दोस्तों जुपिटर प्लानेट सूर्य से पांचवें नंबर स्थित है और यह ग्रह सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह हैं। पीले रंग के इस ग्रह को हिंदी में बृहस्पति ग्रह कहा जाता है। जुपिटर गृह एक गैस जाइंट है यानी कि यह ग्रह गैस से बना हुआ है आसान शब्दों में कहा जाए तो इसकी हमारी पृथ्वी की तरह कोई ठोस सतह नही है। जुपिटर ग्रह का आकार इतना बड़ा है कि इसके अंदर सौरमंडल के सारे ग्रह समा सकते हैं इस ग्रह के अंदर लगभग 1300 पृथ्वी आराम से सेट हो सकती है। दोस्तों अगर जुपिटर ना होता तो हमारी पृथ्वी पर जीवन संभव नही हो पाता क्योंकि जुपिटर अपनी ग्रेविटेशन शक्ति से खतरनाक उल्कापिंडो को पृथ्वी की तरफ नहीं आने देता है। और वे उल्कापिंड जुपिटर के ग्रेविटेशन क्षेत्र में फस कर रह जाते है। दोस्तो क्या जुपिटर अंदर से पूरी तरह खोखला है? क्या हम जुपिटर के वायुमंडल में घुसकर उसके आरपार दुसरी तरफ निकल सकते है? दोस्तों क्या होगा अगर जुपिटर ग्रह के अंदर सलाँग लगाए? आखिर अंदर से कैसा दिखता है जुपिटर प्लानेट? क्या हम जुपिटर पर कदम रख सकते हैं? जब जुपिटर प्लेनेट की कोई ठोस सतह ही नहीं तो इसके अंदर क्या है? दोस्तो इन सवालों का जवाब तो हम जुपिटर पर जाकर ही प्राप्त कर सकते हैं? तो दोस्तो चलिए आज चलते लंबे सफर जुपिटर प्लेनेट की ओर। और हां एक बात अपना राशन पानी साथ ले लेना क्योंकि जुपिटर काफी दूर है।

हेलो दोस्तों मैं हूं आपका दोस्त और होस्ट सुरेश सांचोरी हमारी  application आपको आंतरिक से जुड़ी सटीक जानकारी प्रोवाइड करवाता है
बृहस्पति ग्रह की खोज?

दोस्तो जुपिटर ग्रह की खोज 1610 हुई थी जुपिटर ग्रह को सबसे पहले गेलिलियो गेलिनी ने दूरबीन से देखा था जुपिटर का द्रव्यमान यानी भार हमारे सोरमण्डल के बाकी सभी ग्रहों से ढाई गुना ज्यादा हैं। हमारी पृथ्वी से इसका द्रव्यमान 317.83 गुणा अधिक है। जुपिटर प्लानेट सौरमंडल का सबसे पुराना ग्रह है इस ग्रह पर बाकी ग्रहों की तुलना में सबसे छोटा दिन होता है यह अपनी धुरी पर 9 घण्टे और 55 मिनट मैं एक चक्कर पूरा कर लेता है जल्दी घूमने से ये ग्रह हमें चपटा नजर आता है।

बृहस्पति ग्रह का वायुमंडल ?

जुपिटर प्लानेट प्राथमिक तौर पर गैस और तरल पदार्थो से बना हुआ हैं यह एक चौथाई हीलियम द्रव्यमान के साथ मुख्यरूप से हाइड्रोजन से बना हुआ है इसके सबसे ऊंचे बादल जमी हुई अमोनिया गैस के बने हुए हैं जिनका तापमान लगभग -140 डिग्री सेल्सियस है । दोस्तो यह ग्रह एक उग्र अशांत वायुमंडल से ढका हुआ है जो हाइड्रोजन और हीलियम से बना है ! और जिसमे अमोनिया और मीथेन गैस की भी काफी मात्रा है ! यह वायुमंडल हजारों किलो मीटर की गहराई तक फैला हुआ है धीरे धीरे अत्यधिक दवाव और तापमान के कारण ये गैस द्रव में बदल जाती हैं और इस कारण खगोल शात्रियों का यह मानना है कि इस ग्रह की सबसे अंदरूनी सतह द्रव हाइड्रोजन की बनी है

बृहस्पति की आंतरिक सतह पृथ्वी की सतह से 10 गुना पतली है। इसके भीतर लगभग 80 से 90 फीसदी हाइड्रोजन भरी है।

Jupitar planet के केंद्र में एक छोटी सी चट्टानों की कोर है उस जगह का तापमान लगभग 2000 डिग्री सेल्सियस हो सकता है यह तापमान सूर्य की सतह के तापमान से करीब 3 गुना ज्यादा है इस कोर मै लोहा, सिलिकन और अन्य भारी तत्व हो सकते हैं दोस्तों जब हम इस ग्रह के नजदीक जाते हैं तो इसके तूफानी बादल हमें नजर आएंगे उन्हीं की वजह से यह ग्रह दूर से खूबसूरत नजर आता है इस ग्रह पर दिखने वाले यह खूबसूरत बादल असल में बेहद ज्यादा खतरनाक और जानलेवा है ।
जुपिटर का भयानक तूफान ?

जुपिटर पर पिछले 350 सालो से एक खतरनाक आंधी का बवंडर चल रहा है यह लाल बादलों से मिलकर बना हुआ है दूर से देखने पर यह लाल धब्बे की तरह नजर आता है लेकिन असल में यह लाल धब्बा नही बल्कि खतरनाक तूफान है यह तूफान इतना बड़ा है कि इसके अंदर तीन पृथ्वी आसानी से समा सकती है। इस तूफान के चलने की स्पीड करीब 425 किलोमीटर पर हावर है

इस तूफान को हम पृथ्वी से टेलीस्कोप के जरिए आसानी से देख सकते हैं जुपिटर पर चलने वाला यह भयंकर तूफान कब थमेगा इसका कुछ पता नहीं हैं हो सकता है यह हजारों सालों तक ऐसे ही घूमते रहेंगे दोस्तों इसका कारण यह है कि जुपिटर की अपनी कोई ठोस सतह नही है ना ही इसकी कोई जमीन है यह पूरा का पूरा गृह गैस से मिलकर बना हुआ। इसलिए इसकी स्पीड करने का कोई आधार नहीं हैं। इसके साथ ही जुपिटर का गर्म वायुमंडल तूफानों की गति और तेज कर देता है जब तक इन आंधी के बवंडर में कोई रुकावट नहीं आती तब तक यह कई सदियों तक ऐसे ही चलते रहेंगे।
सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर ?

दोस्तों जुपिटर प्लानेट के 79 ज्ञात उपग्रह है इनमें से 53 का तो ऑफिशियली तोर पर नामकरण भी हो चुका है। जुपिटर को सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर भी कहा जाता है क्योंकि अपनी भारी ग्रेविटेशन शक्ति से सौरमंडल में मौजूद सभी ग्रहों पर एस्ट्रॉयड के विनाशकारी हमले नहीं होने देता हैं और यह अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से खतरनाक उल्का पिंडों को अपनी तरफ खींच लेता है और वह हमारे पृथ्वी के वायुमंडल तक नहीं पहुंच पाते हैं।

जुपिटर पर मिशन?

नासा अब तक जुपिटर पर 7 मिशन भेज चुका है पायनियर 10 सन 1973 में जुपिटर पर भेजे जाने वाला सबसे पहला मिशन था

मिशन पायनियर 10 के द्वारा यह पता चला कि जुपिटर का विकिरण बेल्ट बहुत ही खतरनाक है।

उसके बाद पायनियर 11 को जुपिटर पर भेजा गया। पायनियर 11 के कारण गहरे लाल धब्बों और इस ग्रह के ध्रुवीय क्षेत्रों के बारे में पता चला।

इनके बाद तीसरा और चौथा मिशन वोयेज़र 1 व वोयेज़र 2 था वोईजर 1 एवं 2 की मदद से वैज्ञानिकों ने गैलिलियन उपराग्रहों का पहला विस्तृत मानचित्र तैयार किया, ज्यूपिटर के रिंगों की खोज हुई, सल्फर ज्वालामुखियों की खोज हुई और वहां के बादलों में बिजली कड़कने के दृश्यों को भी रिकॉर्ड किये गए।

साथ ही युलाईसेस मिशन के द्वारा यह पता चला कि सौर हवाओं का ज्यूपिटर के चुम्बकीय वायुमंडल पर बहुत गहरा असर पड़ता है। न्यू होराइजन मिशन के द्वारा ज्यूपिटर के सतहों का एवं इसके चंद्रमाओं का काफी करीबी से फोटो लिया गया। कैस्सीनी मिसन से भी जुपिटर के बारे में काफी अच्छी जानकारी हासिल की।नासा के दो मिशन – गैयलिलियो एवं जूनो मिशन ने इस ग्रह की परिक्रमा भी की है।

बृहस्पति को 1968 में प्रकाशित प्लेनेटरी साइंस डिकेडल सर्वे में नंबर एक प्राथमिकता में रखा गया था। इसलिए Voyager मिशन के बाद से ही वैज्ञानिक जुपिटर प्लेनेट के बारे में और ज्यादा जानकारी लेना चाहते थे कि आखिर जुपिटर प्लानेट के अंदर का वातावरण कैसा होगा? और क्या बृहस्पति का कोई solid surface है या नहीं।

Galileo spacecraft की जुपिटर यात्रा ?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए 1989 में Galileo spacecraft को जुपिटर पर भेजा गया। 1995 तक Galileo अपने 6 वर्षों की यात्रा के बाद हमसे 58 करोड़ 80 लाख किलोमीटर दूर स्थित जुपिटर प्लानेट के ऑर्बिट में पहुंच चुका था दोस्तों इस स्पेसक्राफ्ट के 2 भाग थे। पहला jupiter atmospheric probe यानी lander जिसे बृहस्पति के अंदर जाना था, और दूसरा भाग orbitor जिसे बृहस्पति के orbit में रहकर lander द्वारा जमा की गई डाटा को पृथ्वी पर पहुंचाना था। और इस प्रकार 7 दिसंबर 1995 को टाइटेनियम से बना probe यानि lander, Galileo spacecraft से अलग होता है और कुछ ही समय में जुपिटर के अंदर के वातावरण में एंटर हो जाता है लगभग एक लाख 62 हज़ार प्रति घंटे की तेजी से बृहस्पति का शक्तिशाली gravity, lander को खींच रहा था। लेकिन वैज्ञानिकों ने lander के स्पीड को कम करने के लिए इस पर लगे पैराशूट को खोल दिया पैराशूट खुलने के कुछ समय बाद यह बृहस्पति के atmosphere में पहुंच चुका था। वहां से यह पल पल की जानकारियां ऑर्बिटर को सेंड कर रहा था और orbiter उस डाटा को हमारे वैज्ञानिकों के पास भेज रहा था

बृहस्पति के वातावरण की महत्वपूर्ण जानकारी ?

प्रोब के के जरिए हमें बृहस्पति के वातावरण के बारे में जानकारी मिली उसमें पता चला की बृहस्पति का ऊपरी वातावरण पृथ्वी के वातावरण जैसा नहीं है, बल्कि घने बादलों से भरा है। इन बादलों का आकार अलग-अलग हैं। यहां का वातावरण एक घने धुएं के चेंबर जैसा है जो कि वास्तव में बहुत ही अजीब दिखता है। जुपिटर के बादल अमोनिया हाइड्रोजन सल्फाइड और पानी से मिलकर बना है। इससे हमें यह पता चला कि जुपिटर प्लेनेट पर पानी के बादल मौजूद है इसके साथ ही यह भी पता चला कि जुपिटर पर बारिश भी होती है

जब जुपिटर प्लानेट की कोई ठोस सतह ही नही है तो आखिर यह पानी कहां ठहरता है इस बात का वैज्ञानिकों को पता लगाना था इसलिए प्रोब को और गहराई में उतारा जैसे ही प्रोब नीचे की तरफ उतरा तो वहां पर तापमान और दबाव बढ़ रहा हैं और आसमान में घने और बड़े बादलो की श्रंखला है यह बादल रंग बिरंगे और बेहद ही ज्यादा खतरनाक है यहाँ तापमान इतना ज्यादा है कि बारिश का पानी भाप बन जाता है, और सतह तक जा ही नहीं पाता ?

इस घने बादलों के बाद थोड़ी गहराई में जाते ही हमारे प्रोब को एक भयानक और चौका देने वाला दृश्य दिखता है यहाँ पर ऊपरी बादल खत्म हो जाते हैं, और एक खाली आकाश आता है, इस जगह पर दूर-दूर तक कुछ नहीं दिख रहा है और दिख रहा है केवल आकाश। इस स्थान पर हमें यह पता चला कि बृहस्पति के गहराई में तापमान और दबाव बढ़ता रहता है, जितनी गहराई उतनी ही अधिक तापमान और दबाव।

इस खाली आकाश में ही बारिश का ज्यादातर पानी भाप बनकर फिर से ऊपरी वातावरण में चला जाता है लगभग 156 किलोमीटर गहराई तक जाने के बाद भी प्रोब को कोई सॉलिड सरफेस नहीं मिला करीब 160 किलोमीटर गहराई में जाने के बाद तापमान इतना बढ़ गया कि orbiter से प्रोब का संपर्क टूट गया। तापमान और दबाव के कारण प्रोब पिघल कर भाप बन गया।

juno space crapft की जुपिटर यात्रा ?

गैलिलियो मिशन के जरिए हम जुपिटर प्लानेट के बारे में काफी स्टडी कर चुके थे। लेकिन वैज्ञानिक ग्रह के बारे में और ज्यादा गहराई से जानना चाहते थे इसलिए उन्होंने 2011 में juno space crapft को जुपिटर पर भेजा गया करीब 5 साल बाद जूनो 5 जुलाई 2016 में जुपिटर की कक्षा में दाखिल हो गया। इस मिशन के जरिए वैज्ञानिकों को यह पता चला कि जुपिटर का असल में कोई सॉलिड सरफेस है ही नही। इस ग्रह के काफी गहराई तक केवल गैस के वातावरण हैं। लेकिन यह ग्रह पूरी तरह से अंदर से खोखला नहीं है

इस ग्रह के काफी गहराई में जाने के बाद बादल खत्म हो जाते हैं उसके बाद बीच में एक liquid core आ जाती है , जिसका तापमान करीब 9700 डिग्री सेल्सियस है। यहां का दबाव इतना अधिक है, कि हाइड्रोजन के एटम्स नॉर्मल से अलग लिक्विड अवस्था में बदल जाते हैं जिसे metallic hydrogen कहते हैं।

हाइड्रोजन का यह रूप एक इलेक्ट्रिक कंडक्टर की तरह काम करता है, इसलिए इस liquid core के कारण ही बृहस्पति का विशाल magnetosphere बनता है। Juno ने यह साबित कर दिया कि बृहस्पति गैस का एक विशालकाय ग्रह है, जिसका केमिकल कंपोजिशन किसी तारे के समान है, बृहस्पति के केमिकल कंपोजिशन किसी तारे के समान होने से कुछ वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि बृहस्पति असल में एक असफल तारा है। Juno अभी भी बृहस्पति के orbit में रहकर लगातार बृहस्पति को स्टडी कर रहा है।

दोस्तों जुपिटर ग्रह का ध्रुवीय व्यास 133709 हैं। यह ग्रह सूर्य से 77 करोड़ 83 लाख 40 हजार 821 किलोमीटर है।

   धन्यवाद ।।।


Comments

  1. please comment on my page
    The star Fast cm Tv Watching on your YouTube channel. thanks

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  2. Rambro lagyo feri feri pani yatai blog padna pam...

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